‘द एक्सिडेन्टल प्राइम मिनिस्टर’ में गांधी परिवार पर हमले का माध्यम बने हैं डॉ मनमोहन

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अनुपम ने लाचार, मजबूर मगर देशभक्त के रूप में रोल निभाया

अनुपम ने लाचार, मजबूर मगर देशभक्त के रूप में रोल निभाया

वाकई अनुपम खेर की मां ने फ़िल्म द एक्सिडेन्टल प्राइम मिनिस्टर का जो रिव्यू दिया है उसमें फ़िल्म की पूरी समीक्षा है। अनुपम खेर अपने स्वाभाव के विपरीत नज़र आते हैं। उनका शरीर भी मनमोहन सिंह की तरह व्यवहार करते हुए खामोशी को उछल-उछल कर बयां करता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बेचारे भी लगे हैं, शरीफ भी। कई की नज़रों में बेवकूफ़ भी और किसी-किसी के लिए बहुत तेज भी। फिर भी अनुपम खेर को उनकी एक्टिंग के लिए नम्बर देने का पैमाना उनकी मां से अलग हो सकता है, फिर भी अनुपम खेर ने लाजवाब एक्टिंग की है ये सभी दर्शक बता रहे हैं।

फ़िल्म में मनमोहन सिंह मतलब शरीफ, बेवकूफ और तेज व्यक्ति भी
पूरी फ़िल्म दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को शरीफ, बेवकूफ और नतमस्त होकर 10 साल तक प्रधानमंत्री रह जाने वाले बहुत तेज व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है। मगर, कहानी का संदेश कहानी का मुख्य पात्र नहीं है। कहानी एक व्यक्ति, एक परिवार और उनके हाथों में समूचा देश- यही दिखाने की कोशिश की गयी है। निशाना सोनिया गांधी है, कांग्रेस है। निशाना परिवारवाद, वंशवाद के नाम पर गांधी-नेहरू परिवार है।

कॉस्मेटिक्स से लेकर मेकअप तक में गांधी परिवार के लिए नकारात्मक भाव

कॉस्मेटिक्स से लेकर मेकअप तक में गांधी परिवार के लिए नकारात्मक भाव

आम तौर पर किसी फ़िल्म में आप मेकअप से संदेश पा लेते हैं कि कौन विलेन है और कौन हीरो। सोनिया गांधी के किरदार में सुजान बर्नेट के तीखी भवें और गहरे मेकअप उन्हें बिना कहे विलेन साबित कर रहे हैं। यहां तक कि राहुल के रूप में अर्जुन माथुर और प्रियंका के रूप में आहना ने खुद को इस तरह पेश किया है मानो वे एक्टिंग नहीं, मिमिक्री कर रहे हों। गांधी परिवार के सदस्यों के लिए भूमिका को इस तरह गढ़ा गया है और पात्रों ने उसे इस रूप में जीया है मानो वे एक्टिंग नहीं कर रहे हों, हास्य गढ़ रहे हों।

संजय बारू की भूमिका में अक्षय खन्ना दिखे जबरदस्त
संजय बारू के रूप में अक्षय खन्ना की भूमिका हीरो वाली है। वे ‘सच बताने वाले’ के तौर पर हैं। लिहाजा सारे डायलॉग उनके अनुकूल हैं। अपने किरदार से अक्षय खन्ना ने संजय बारू की किताब को किसी हद तक जीवंत बना दिया है। परीक्षा की हर घड़ी में डॉ मनमोहन सिंह को देशभक्त साबित किया है, वहीं लाचार और मजबूर भी दिखाया है। कुछ इस तरह, जिससे दर्शकों को उनके प्रति सहानुभूति हो। डॉ मनमोहन सिंह के लिए सहानुभूति का अर्थ सोनिया गांधी और उनके परिवार के लिए नफरत या गुस्सा होता है। मगर, ये बात कही नहीं गयी है, महसूस करने लायक है।

फ़िल्म में मनमोहन सिंह बेचैन भी दिखे, गुस्से में भी

फ़िल्म में मनमोहन सिंह बेचैन भी दिखे, गुस्से में भी

न्यूक्लियर डील के समय डॉ मनमोहन सिंह की ओर उठी उंगली हो या फिर राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री की कैबिनेट में पारित बिल को फाड़ने की घटना, मनमोहन सिंह के मन की बेचैनी दिखाई गयी, परेशानी और गुस्सा भी दिखाया गया है। मगर, यह सब दिखाते हुए गांधी परिवार के प्रति एक अलग सोच पैदा हो, इसका भी ख्याल रखा गया है।

वैचारिक पूर्वाग्रह के साथ बनी है फ़िल्म
यह फ़िल्म अनपुम खेर को अच्छी लग सकती है क्योंकि वे एक राजनीतिक विचारधारा के साथ जुड़े हैं। वह विचारधारा गांधी परिवार की विचारधारा से उलट है। मगर, किसी कांग्रेसी को कतई अच्छी नहीं लग सकती। इसलिए आम कांग्रेसी इस फ़िल्म पर गुस्सा दिखा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सिनेमाघर मालिकों ने फ़िल्म को दिखाने से मना कर दिया है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने पूरे प्रदेश में गुस्सा दिखाया है। वहीं, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने से मना किया है। उनका कहना है कि असहमत होने के बावजूद वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ हैं।

राजनीतिक दुष्प्रचार का माध्यम नज़र आयी फ़िल्म

राजनीतिक दुष्प्रचार का माध्यम नज़र आयी फ़िल्म

जिस तरह से सोशल मीडिया पर बीजेपी समर्थक फ़िल्म देखने से लेकर प्रतिक्रियाओं को व्यक्त करने में होड़ दिखा रहे हैं उससे भी यही लगता है कि यह फ़िल्म चुनावी फ़िल्म बन गयी लगती है। फ़िल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक हों या एक्टर सबने एक ख़ास सोच को अंजाम दिया है। फ़िल्म का मकसद कांग्रेस को कोसना, वंशवाद और परिवारवाद की निन्दा करना और ये सब कहने के लिए डॉ मनमोहन सिंह के किरदार को पकड़ना- यही फ़िल्म का मकसद है। संजय बारू की किताब इस कहानी को रोचक बनाने में माध्यम की तरह इस्तेमाल हुई है। राहुल गांधी ने जब प्रधानमंत्री के प्रस्तावित बिल का मसौदा फाड़ा था, तब संजय बारू प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार की भूमिका से भी हट चुके थे।