विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हृदय रोग महिलाओं में मृत्यु का तीसरा प्रमुख कारण है। हाल ही हुए एक सर्वे के अनुसार भारत में 5 में से 3 शहरी महिलाएं हृदय की किसी न किसी समस्या से पीड़ित हैं। 35-44 आयुवर्ग की महिलाओं में इसका खतरा तेजी से बढ़ रहा है। जानिए इसके खतराें के बारे में :-

20 की उम्र में
20 की उम्र में कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर टेस्ट और डायबिटीज स्क्रीनिंग टेस्ट करा लें ताकि रोग का पता प्रारंभिक अवस्था में ही चल जाए। एक बार यह टेस्ट कराने के बाद डॉक्टरी सलाह से नियमित जांच कराती रहें।

30 का पड़ाव
आजकल महिलाएं कामकाजी हो गई हैं। 8-10 घंटे कम्प्यूूटर के सामने बैठकर काम करना, एक्सरसाइज न करना, नींद की कमी, जंक फूड का सेवन हृदय रोगों की आशंका को दोगुना कर देते हैं। इसलिए संतुलित और पौष्टिक भोजन करेंं। कैलोरी इनटेक शारीरिक सक्रियता और मेटाबॉलिज्म के अनुसार होना चाहिए।

40 में हो जाएं सतर्क
घर-परिवार की जिम्मेदारियों व कार्यस्थल के तनाव के कारण महिलाओं में मानसिक तनाव का स्तर बढ़ा है। इससे उनमें प्री-मैच्योर मेनोपॉज होने लगा है जिससे एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है। एस्ट्रोजन महिलाओं में हार्ट अटैक के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है। इसलिए जिम्मेदारियों और कामकाज के बीच खुद के लिए भी थोड़ा समय जरूर निकालें।

50 में करें व्यायाम
इस उम्र तक आते-आते अधिकतर महिलाएं मेनोपॉज के स्तर तक पहुंच जाती हैं। मेनोपॉज के बाद महिलाओं के हृदय के आसपास वसा का जमाव अधिक हो जाता है जो हृदय रोगों के लिए एक बड़ा खतरा है। उम्र बढऩे के साथ ही उच्च रक्तचाप, डायबिटीज और रक्तमें कोलेस्ट्रॉल के उच्च स्तर जैसी समस्याओं की आशंका भी बढ़ती है। मेनोपॉज के बाद अधिकतर महिलाओं का वजन भी बढ़ता है इसलिए योग, व्यायाम से मोटापा कम करें।

55 वर्ष के बाद
55 वर्ष के पश्चात महिलाओं के हृदय रोगों की चपेट में आने की आशंका पुरुषों के समान ही होती है। महिलाओं को 50 वर्ष की उम्र के बाद अपने खानपान पर नियंत्रण रखना चाहिए। उन्हेें चाहिए कि वे शारीरिक रूप से सक्रिय रहें और नियमित शारीरिक जांच कराएं।