नई दिल्ली। लोकतंत्र का महापर्व चुनाव के लिए रणभेरी बज चुकी है और सियासी दलों में हलचल भी तेज हो गया है। अब मतदान होने में एक महीने से भी कम वक्त रह गया है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल अपने विरोधियों को हराकर सत्ता में काबिज होने के लिए जीन-जान से मेहनत कर रहे हैं। बात करें सबसे बड़े राज्य (सीटों के लिहाज से) उत्तर प्रदेश की तो यहां पर भाजपा की 2014 वाली आंधी को रोकने के लिए इस बार बसपा-सपा ने आपसी गठजोड़ की दीवार खड़ी कर दी है, जिससे पार पाना भाजपा के लिए कतई आसान नहीं होगा। वहीं महागठबंधन की आस में बैठी कांग्रेस को जब सपा-बसपा ने भाव नहीं दिया तो अकेले दम पर ही ताल ठोकने के लिए मैदान में उतरी है। कांग्रेस ने अपनी नैया को पार लगाने के लिए इस बार प्रियंका गांधी वाड्रा को भी मैदान में उतारा है। इन सबके बीच एक सवाल अहम है कि उत्तर प्रदेश के बाहर बसपा किस हद तक कांग्रेस और भाजपा को रोकने में कामयाब रहेगी। क्योंकि जातिगत और सामाजिक समीकरण के आधार पर देखें तो बसपा को अकेले फायदा मिलता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

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उत्तर प्रदेश के बाहर भी बसपा असरदार?

बता दें कि बीते वर्ष दिसंबर में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव हुए, जिसमें बसपा ने दमखम के साथ अपने उम्मीदवार उतारे और चुनाव लड़ी, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिल सका। हालांकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मौजूदा स्थिति में देखें तो बसपा के पास एक भी लोकसभा सांसद नहीं है, हालांकि पांच राज्य सभा सांसद जरूर है। जबकि विधायकों की बात करें तो भी कोई खास प्रभाव उत्तर प्रदेश के बाहर दिखाई नहीं देता है। बता दें कि बसपा के उत्तर प्रदेश में 19, राजस्थान (6), मध्य प्रदेश (2), छत्तीसगढ़ (2), हरियाणा (1), झारखंड (1) और कर्नाटक में एक विधायक हैं।

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बसपा-सपा का गठबंधन

बता दें कि बसपा-सपा का गठबंधन पहली बार गोरखपुर, फुलपुर और कैराना के उपचुनाव के दौरान देखने को मिला था। उस दौरान बसपा-सपा के गठबंधन ने ऐसी मात दी कि भाजपा अपनी पारंपरिक सीट गोरखपुर और कैराना तक भी नहीं बचा सकी। इस सफल प्रयोग के बाद अब लोकसभा के चुनाव में इसे आजमाया गया है, देखना दिलचस्प होगा कि यह गठबंधन कितना असरदार रहता है?

 

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