नई दिल्ली। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान कोलकाता में हिंसा और आगजनी की घटनाओं के बाद से पश्चिम बंगाल मेें सियासी जंग चरम पर पहुुंच है। हिंसक घटनाएं वहां तब हो रही हैं जब चुनाव आयोग ने सुरक्षित तरीके से मतदान के लिए भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की है। बडे़ पैमाने पर जारी हिंसक घटनाओं को देखते हुए यह कयास लगाए जाने लगे हैं कि कहीं हिंसक घटनाएं सियासी बदलाव के संकेत तो नहीं हैं।

हिंसा क्यों
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा के मुताबिक बढ़ती हिंसा के पीछे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत छिपा हुआ है। टीएमसी पश्चिम बंगाल में वामदलों को सत्ता से उखाड़ फेंकने के बाद पहली बार कड़े प्रतिरोध का सामना कर रही है। टीएमसी के सामने यह चुनौती पश्चिम बंगाल में भाजपा ने पेश की न कि कांग्रेस या वामपंथी पार्टियों ने। जबकि आजादी के बाद से अब तक के 72 वर्षों के दौरान पश्चिम बंगाल में भाजपा का राजनीतिक असर कभी नहीं रहा। ये बात टीएमसी को हजम नहीं है।

हिंसक घटनाओं में निशाने पर भाजपा
लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण में अलीपुरदुआर और कूच बिहार में टीएमसी और भाजपा समर्थकों के बीच हिंसा हुई। टीएमसी समर्थकों ने लेफ्ट फ्रंट प्रत्याशी गोविंदा राय पर जानलेवा हमला किया। दूसरे चरण में रायगंज के इस्लामपुर में सीपीआई एम सांसद मो. सलीम पर जानलेवा हमला। तीसरे चरण में हिंसा की 1500 शिकायतें यहां से चुनाव आयोग को मिलीं। इस चरण में बूथों पर बमबारी की घटनाएं भी हुईं। मुर्शिदाबाद में 56 वर्षीय कांग्रेस समर्थक की टीएमसी समर्थकों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। हिंसा की घटनाओं में शामिल 60 लोग गिरफ्तार हुए। चौथे चरण में आसनसोल में टीएमसी कार्यकर्ताओं और सुरक्षाबलों में जमकर झड़पें हुईं। केंद्रीय मं;ी बाबुल सुप्रियो पर हमला हुआ और उनकी कार के शीशे तोड़ दिए गए। पांचवें चरण बैरकपुर में भाजपा और टीएमसी समर्थकों के बीच झड़पें हुई। भाजपा प्रत्याशी अर्जुन सिंह ने टीएमसी कार्यकर्ताओं पर हमला करने का आरोप लगाया।

हत्या और जानलेवा हमला
छठे चरण में मतदान शुरू होने के कुछ घंटे पहले एक भाजपा कार्यकर्ता की हत्या और दो पर जानलेवा हमला। घाटल और तामलुक में भाजपा प्रत्याषी भारती घोष पर हमला। इसके अलावा वीरभूम, झारग्राम, बांकुरा, कोलकाता, मेदिनीपुर, पुरुलिया, जाधवपुर में हुए हमलों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष, पूर्वोत्तर भारत के बड़े भाजपा नेता हिमंत बिस्व सरमा, भाजपा नेता मुकुल राय, अनुपम हाजरा, कोलकाता रोड शो अमित शाह रोड शो, रैली पर रोक सीएम व हिंसक झड़पें और आगजनी की घटनाएं मंगलवार को हुई हैं।

एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करे चुनाव आयोग

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुदेश वर्मा के मुताबिक ममता सरकार ने पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक परंपराओं का ताड़ ताड़कर करने का काम किया अब पश्चिम बंगाल में टीएमसी का सीधा मुकाबला भाजपा से हैं। भाजपा के बढ़े राजनीतिक कद से वह घबरा गई हैं। संवैधानिक व्यवस्था को दरकिनार कर उन्होंने वो अपने कार्यकर्ताओं के जरिए हिंसा को बढ़ावा दिया है। ताकि भाजपा के लोगों के खौफ पैदा हो सके। आए दिन भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याएं और हिंसक घटनाएं होने लगी हैं। ममता सरकार रोड शो के नाम पर भाजपा को बदनाम करने में लगी है।
यही वजह है कि भाजपा नेताओं के रोड शो, जनसभा व चुनावी गतिविधियों को वो हिंसा बढ़ावा देने वाला कार्यक्रम करार देना चाहती हैं। जबकि भाजपा इन हिंसकी घटनाओं में खुद विक्टिम है। उन्होंने चुनाव आयोग ने अंतिम चरण का मतदान किसी एडमिनिस्ट्रेटर को नियुक्त कर कराने की मांग की है। यहां तक कि राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की भी मांग की है। उन्होंने ममता सरकार पर संघवाद के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता भाजपा के साथ है और हम टीएमसी को सियासी जवाब देने में सक्षम हैं।

केंद्र से कभी नहीं बैठी पटरी
पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है, जिसकी केंद्र सरकार से कभी नहीं पटरी नहीं बैठी। यहां जो भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है, वह अपनी प्रजा को छोड़कर बाकी सबका होता है। केंद्र में जब भी खिचड़ी सरकार बनती है, तब इनकी बांछें खिल जाती हैं। क्योंकि उन्हें उनकी औकात से अधिक सम्मान मिलने लगता है। केवल कुछ ही सांसदों के बल पर ये सरकार पलट देने की धमकी देते रहे हैं। इसलिए वे जो चाहते हैं, वैसा हो जाता है। पूर्व सरकार में ममता बनर्जी रेल मंत्री जैसा मंत्री पद प्राप्त कर लेती थीं। फिर अपने हिसाब से वही करतीं, जो उनके मन में आता।

मोदी सरकार के बाद लेना पड़ता एप्वाइंटमेंट
केंद्र में गठबंधन का दौर करीब तीन दशक तक जारी रहा। 2014 में पहली बार पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार बनी और उसी के साथ स्थितियां भी बदल गईं। उसके बाद से ममता अपने मन की नहीं कर पा रहीं हैं। इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से काफी चिढ़ है। अब उन्हें पीएम मिलने के लिए अपाइटमेंट लेना पड़ता है। उनके लिए पीएमओ में रेड कार्पेट नहीं बिछाए जाते थे। पीएमओ में बेरोकटोक एंट्री बंद हो गया है। ममता बनर्जी इस स्थिति को खुद के लिए अपमानजनक मानती हैं।

अपमान का बदला
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वह अपने अपमान का बदला ले रही हैं। काफी समय से देखा जा रहा है कि केवल चुनाव ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के जो भी निर्णय हों, उसका विरोध करना ही उनका पहला कर्तव्य हो गया है। सीबीआई के अधिकारी पूछताछ के लिए जब पश्चिम बंगाल जाते हैं, तो उन्हें विरोध का सामना करना पड़ता है। इससे पता चल जाता है कि उनकी नीयत कैसी है?

2019 का सियासी समीकरण अनुकूल नहीं
ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव किसी तरह भी लाभदायी नहीं है। थोड़ी देर के मान भी लें कि मोदी सरकार की वापसी नहीं होगी तो भी सियासी परिस्थितियां ममता के अनुकूल नहीं होगा। ऐसा इसएिल कि महागठबंधन पर या तो मायावती प्रभावी हैं या राहुल गांधी। थर्ड फ्रंट के हावी होने पर भी के चंद्रशेखर राव या किसी और का नाम आगे आ जाता है। केंद्र में दस्तक देने के लिए पश्चिम बंगाल की वामपंथी पार्टियां भी उनके साथ नहीं हैं।

टीएमसी कर रही है वामपंथियों वाला काम

पश्चिम बंगाल में 1952 से लेकर 1977 तक कांग्रेस का राज रहा। 1977 मे ंपहली बार आपातकाल के बाद 1977 में वामपंथी पार्टियों में सत्ता में आने का मौका मिला। वामपंथी पार्टियां 1977 से 2011 तक यानि लगातार 34 साल हिंसा के बल पर सत़ता पर काबिज रहीं। इन तीन दशकों में करीब 28,000 राजनीतिक हत्याएं वामपंथी पार्टियों ने कराए। 20111 से पश्चिम बंगाल में टीएमसी सत्ता में है। सीएम ममता बनर्जी सत्ता में बने रहने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी वही काम कर रही हैं जो दशकों तक वामपंथियों ने किया। लोकसभा चुनाव के छह चरण में वहां जिस प्रकार की हिंसा हुई, उससे तो कश्मीर घाटी को भी पीछे छोड़ दिया। वहां की हिंसा देखकर घाटी पहली बार शर्म से लाल हुई।